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सोमवार, 14 दिसंबर 2015

हमारे जीवन में यह जानकारी रखना बहुत जरूरी है

नवजात शिशु का वजन-

आमतौर पर प्रसव के बाद बच्चे का वजन शुरुआत में कुछ घटता है। एक सप्ताह में उसका वजन उतना ही हो पाता है, जितना की उसके जन्म के समय होता है। इसके बाद एक स्वस्थ बच्चे का वजन लगभग 30 ग्राम नियमित रूप से बढ़ता है। परन्तु यह तभी सम्भव होता है, जब बच्चा सामान्य विधि द्वारा दूध पीने लगता है।

तापमान-

जन्म लेने के बाद बच्चे के शरीर का तापमान कम होना शुरू हो जाता है। इस कारण बच्चे के शरीर का तापमान बनाने के लिए बच्चे को गर्म बनाये रखना चाहिए।

पीलिया-

कई बच्चों को जन्म के बाद पीलिया हो जाता है। पीलिया 3 प्रकार का होता है।

1. फिजियोलोजिकल जौण्डिस-

शारीरिक क्रिया द्वारा पीलिया का होना। इस प्रकार का पीलिया बच्चो को जन्म लेते ही हो जाता है। दूसरे दिन इस पीलिये के लक्षण बच्चे के शरीर पर काफी दिखाई देने लगते हैं लेकिन सातवें दिन तक इसके लक्षण कम हो जाते हैं। इस प्रकार के पीलिए से नवजात शिशु को हानि नहीं होती है। इस प्रकार का पीलिया बच्चे में अधिक रक्त में लाल कण होने से होता है। बच्चे के जन्म लेने पर इतने अधिक लालकण की जरूरत नहीं होती है। इस कारण यह कण टूटना या नष्ट हो जाना शुरू हो जाता है तथा बिलीरूबिन के रूप में त्वचा के नीचे इकट्ठा हो जाते हैं। जिस कारण बच्चे के शरीर की त्वचा का रंग पीला दिखाई पड़ता है। इसको शारीरिक क्रिया द्वारा उत्पन्न पीलिया कहते हैं। इसके उपचार हेतु बच्चे को सूर्योदय का प्रकाश दिखाने से लाभ होता है क्योंकि सुबह के समय सूर्य के प्रकाश में अल्ट्रावायलेट किरणें होती हैं। यह पीलिया उन बच्चों को अधिक होता है। जिनको प्रसव के लिए प्रेरित करना पड़ता है। प्रसव के लिए प्रेरित करने से बच्चेदानी का दबाव अधिक हो जाता है तथा अधिक रक्त के लालकण बच्चे में आ जाते हैं और पीलिया रोग उत्पन्न करते हैं।
जन्म लेने के तुरंत बाद मां का कोलोस्ट्राम युक्त दूध पीने से बच्चे को पीले और हरे रंग का मल आता है। इस मल में बिलीरूबिन होता है। इस प्रकार से बिलीरूबिन मल के द्वारा बच्चे के शरीर से बाहर निकल जाता है और बच्चा जल्द ही पीलिया रोग से मुक्त हो जाता है। यदि मां यह कोलेस्ट्रम युक्त दूध बच्चे को नहीं पिलाती है तो बच्चा मल त्याग नहीं कर पाता है तथा यही बिलरुबिन फिर से रक्त में चला जाता है। इस प्रकार फीजियोलोजिकल पीलिया को समाप्त करने में मां के दूध की प्रमुख भूमिका होती है। बच्चे को अधिक पानी पिलाने से भी इस प्रकार के पीलिया में लाभ मिलता है।
रक्त की जांच कराके यदि इस समय बच्चों में पीलिया देखा जाए तो यह अधिक से अधिक यह 10 मिलीग्राम/100 मिलीलीटर होगा।
2. असामान्य पीलिया-

जब बच्चे का रक्त मां के रक्त से नहीं मिलता हैं और उसमें भिन्नता होती है तो बच्चे के शरीर में शीघ्र पीलिया पनपने लगता है। यह हानिकारक होता है तथा इसकी चिकित्सा शीघ्र ही करनी चाहिए। वरना बच्चे को हानि हो सकती है। बच्चे का मस्तिष्क क्षीण होने लगता है और बच्चा कोमा में पहुंच जाता है। इस प्रकार के बच्चों का शीघ्र पूर्ण रक्त बदलना पड़ता है। ऐसी अवस्था में भी स्त्री बच्चे को दूध पिला सकती है। इस समय बच्चे को अच्छे हॉस्पिटल में रखना चाहिए जहां सभी प्रकार की सुविधा उपलब्ध हों।

पीलिया और मां का दूध-

इस प्रकार के पीलिए में बच्चे अस्पताल में ठीक रहते हैं लेकिन अस्पताल से घर जाने के लगभग एक सप्ताह बाद उनमें पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यह मां के दूध के कारण होता है। इस प्रकार के पीलिए में भी सीरम बिलीसबिन 20 मिलीग्राम/100 एम.एल. तक बढ़ जाता है परन्तु यह अधिक हानिकारक नहीं होता क्योंकि बच्चे के मस्तिष्क में रक्त संचार अच्छा बन चुका होता है। सभी प्रकार के पीलिये का शीघ्रता और सावधानी से उपचार कराना चाहिए।

बच्चे के रक्त में शक्कर की मात्रा कम होने पर या मां के द्वारा अधिक दवाइयों का सेवन करने के कारण भी बच्चे को पीलिया हो सकता है।

पीलिया में अधिक मात्रा में पानी, सूर्य का प्रकाश, फोटोथैरपी (अल्ट्रावायलेट किरणें देने का यन्त्र) देने से बच्चे को लाभ होता है। इस पर भी मां को बच्चे के पीलिया रोग पर नजर रखनी चाहिए, अपने डॉक्टर की समय-समय पर राय लेते रहने चाहिए और रक्त की भी जांच करवाते रहना चाहिए।

मां को यदि टी.बी. कैंसर या मिर्गी का दौरा पड़ता हो या फिर वह कोई ऐसी दवा आदि का सेवन करती हो जिससे बच्चे को नुकसान पहुंच सकता हो तो ऐसी अवस्था में उसे बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाना चाहिए।
यदि मां को सर्दी-जुकाम या बुखार हो तो उसे सावधान रहना चाहिए कि बच्चे को दूध पिलाने से यह रोग बच्चे में भी न पहुंच जाए।
स्वस्थ स्त्रियां जितना अधिक स्तनपान अपने बच्चे को कराती हैं, बच्चे का शरीर उतना ही रोगों से सुरक्षित रहता है। इस प्रकार बच्चे में रोग से लड़ने की क्षमता स्वयं ही आ जाती है।
मां द्वारा नींद की दवा, थाईरायड की दवा, दस्तों के होने की दवा आदि लेने से बच्चे को भी नींद होती है। ऐसी अवस्था में उसे अपने बच्चे को स्तनपान नहीं कराना चाहिए।
यदि बच्चे का दूध छुड़ाना हो तो धीरे-धीरे छुड़ाना ही ठीक रहता है।
बोतल से दूध पीने वाला बच्चा मोटा और भारी हो सकता है लेकिन स्तनपान कराने वाला बच्चा शरारती और चुलबुले स्वभाव का होता है।
मां को उसके कार्य के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
पहली, गृहस्थी में रहने वाली स्त्रियां जो हर समय बच्चे के पास रहती हैं और उसे कभी भी स्तनपान करा सकती हैं।
दूसरी, नौकरी पर जाने वाली स्त्रियां जो सात-आठ घंटे की नौकरी करती हैं। वह सुबह 2 बार बच्चे को स्तनपान करा के नौकरी पर जा सकती है। बीच के समय बच्चे को बोतल का दूध भी पिया जा सकता है तथा फिर आने के बाद बच्चे को अपना दूध दे सकती हैं।
तीसरी, वह स्त्रियां जो लम्बी नौकरी पर रहती हैं जैसे डॉक्टर, एयर होस्टेस या टूर पर रहने वाली आदि। ये स्त्रियां अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करा पाती है इसलिए इसका समाधान केवल बोतल वाला दूध होता है।
यदि मां को कोई अन्य रोग हो, स्तन में बीमारी हो, स्तन पक गये हों, निप्पल फट गये हों या त्वचा का रोग हो तो बच्चे को बोतल का दूध पीने को दिया जा सकता है।
कई स्त्रियों में यह गलतफहमी होती है कि स्तनपान कराने से स्तन ढीले होकर लटक जाते हैं तथा शरीर खराब हो जाता है। जबकि स्तनपान कराने के स्त्रियों के शरीर की सुन्दरता बढ़ती है।
मां के दूध से बच्चे को कोई एलर्जी नहीं हो पाती तथा बच्चा छोटे-मोटे रोगों जैसे- खांसी, जुकाम, दस्त, सांस का रोग, त्वचा के रोग से बचा रहता है।
मां का दूध हमेशा बच्चे के पीने के लिए तैयार रहता है। मां का दूध न तो गर्म करना पड़ता है न ही इस दूध में मीठा पदार्थ डालना पड़ता है। यह दूध बच्चे को सभी रोगों से दूर रखता है। यह शीघ्र पाचक तथा अधिक लाभदायक होता है।
बोतल का दूध साफ और उबला न होने पर बच्चे को दस्त, बुखार आदि होने की संभावना होती है। बोतल का दूध देने से पहले उसका तापमान अवश्य देख लेना चाहिए। अधिक गर्म दूध पिलाने से बच्चे का मुंह जल सकता है।
बच्चे को दूध का पाउडर भी दिया जा सकता है। 25 ग्राम पानी में एक चम्मच पाउडर डालना चाहिए। अधिक पतला दूध बच्चे के वजन को बढ़ने नहीं देता तथा अधिक गाढ़ा दूध भी बच्चे के लिए हानिकारक होता है। गाढे़ दूध से बच्चे के रक्त में मिनरल की मात्रा अधिक हो जाती है जिससे बच्चे में कब्ज, पानी की कमी और अन्य रोग उत्पन्न होने लगते हैं।
बच्चे को एक ही पाउडर का दूध पीना चाहिए ताकि उसका पेट ठीक रहता है।
बचा हुआ दूध बच्चे को दुबारा से गर्म करके पिलाना हानिकारक होता है।
गाय के दूध में ममता होती है। भैंस के दूध में चर्बी अधिक होती है। गाय का दूध हल्का होता है तथा शीघ्र ही पच जाता है। गाय के दूध में प्रोटीन मां के दूध से भी अधिक होता है। अधिक मात्रा में प्रोटीन शरीर में अधिक नाइट्रोजन उत्पन्न करता है। यह बच्चों के गुर्दों को कमजोर करता है। इस कारण गाय के दूध में 25 प्रतिशत पानी मिलाकर बच्चों को पिलाना चाहिए जिससे प्रोटीन, सोडियम और नाईट्रोजन हल्के हो जाएं और बच्चे के गुर्दे कमजोर न हों।
मां का दूध गाय के दूध से अधिक मीठा होता है क्योंकि मां के दूध में लैक्टोज अधिक होता है।
3. फोन्टेनली-

जन्म के बाद बच्चे के सिर के अगले भाग व पिछले भाग पर एक मुलायम त्रिकोण आकार का उभार होता है जिसको फोन्टेनली कहते हैं। इस भाग में क्योंकि हड्डी नहीं बन पाती, इस कारण ये भाग केवल एक मुलायम झिल्ली और त्वचा से ढका रहता है जिसको भरने में 9 से 18 महीने लग जाते हैं।

जन्म के निशान-

बच्चे का जन्म होने के बाद बच्चे की पलकों, माथे, हाथ व शरीर के अन्य अंगों पर छोटा और लाल रंग का निशान होता है। यह निशान एक साल के अन्दर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

नीला दाग-

गहरा नीला दाग बच्चे की पीठ के निचले भाग पर होता है। यह दाग भी लगभग एक-डेढ़ साल में समाप्त हो जाता है।

नींद-

बच्चे को जन्म लेने के 6 महीने के बाद तक 18 से 20 घंटे तक प्रतिदिन सोना चाहिए।

रोना-

बच्चा तभी रोता है जब वह भूखा हो, गीला हो, सर्दी-जुकाम, गैस या फिर पेट में दर्द हो। ऐसी स्थिति में अधिक समय तक बच्चे को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए तथा डॉक्टर से सलाह-मशविरा करते रहना चाहिए।

मल-

सामान्यत: बच्चे को जन्म के पहले 24 घंटों में मलत्याग कर देना चाहिए। बच्चे का पहला मल काला और चिकना होता है। इसके बाद मल का रंग हरा और काला हो जाता है। 3-4 दिनों के बाद इसका रंग पीला हो जाता है। प्रतिदिन बच्चे को 3 से 4 बार मलत्याग करना चाहिए। लगभग 6 महीने के बाद बच्चे को मलत्याग प्रतिदिन केवल दो बार ही करना चाहिए।

मूत्र-

जन्म के 36 घंटे में शिशु द्वारा मूत्र त्यागना आवश्यक होता है। ऐसा न होने पर डॉक्टर को सूचित करना चाहिए।

स्तन-

कभी-कभी बच्चे के स्तन में सूजन और दूध की बूंद निकल सकती है। ये मां के उत्तेजित द्रव के कारण होता है। ये सूजन कुछ सप्ताह में स्वयं ही समाप्त हो जाती है। इसे न तो दबाना चाहिए और न ही मालिश करनी चाहिए। इसी उत्तेजित द्रव के कारण स्त्री बच्चे (फीमेल चाइल्ड) में योनिद्वार पर रक्त के कुछ निशान भी देखें जा सकते हैं जो धीरे-धीरे स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं।

अण्डकोष-

नर बच्चे के पैदा होने के बाद अण्डकोष के आकार से गर्भ में बच्चे की अनुमानित आयु लगायी जा सकती है। समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे के अण्डकोष आकार में छोटे होते हैं। अण्डकोष का रंग काला या भूरा होता है।

बच्चे को नहलाना-

जब तक नाभि की नाल लगी हो, नाल के गिर जाने के बाद नाभि सूखी न हो या बच्चे के पैदा होने पर आपने खतना करा रखा हो हो ऐसी सूरत में बच्चे को केवल गुनगुने पानी से ही हल्का सा नहलाना ठीक रहता है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रतिदिन गुनगुने पानी का प्रयोग करें। बच्चे के चेहरे तथा पेशाब व मलद्वार को साफ करके सूखा रखना आवश्यक होता है।

बच्चे को टब में स्नान कराते समय इतना पानी लें जिससे बच्चे की कमर तक पानी रहे। स्नान कराते समय बच्चे को टब में उल्टा नहीं करना चाहिए, टब में बच्चे को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। बच्चे को कम समय तक स्नान करायें तथा बच्चे के शरीर पर साबुन का उपयोग न करें। बच्चे के गर्दन, हाथ-पैरों के मोड़ों को अधिक साफ रखना चाहिए। नहलाने के बाद बच्चे के शरीर पर इत्र (परफ्यूम) का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

बच्चे के आंख और कान की साफ-सफाई-

स्नान कराते समय बच्चे के कान में पानी नहीं जाने देना चाहिए। इसलिए स्नान कराते समय दोनों कानों में रूई लगा देनी चाहिए। स्नान के बाद कानों की रूई बाहर निकालकर कान को सुखाना चाहिए। कानों में किसी भी प्रकार के तेल का उपयोग नहीं करना चाहिए। गुनगुने पानी में रूई को गीला करके बच्चे की आंखों को साफ करना चाहिए।

मलद्वार की सफाई-

मलत्याग करने के बाद बच्चे के मलद्वार को गुनगुने पानी या रूई से साफ करना चाहिए तथा किसी सूती कपड़े से उसे पोंछकर सुखा लेना चाहिए। सप्ताह में एक बार वेसलीन या क्रीम आदि का प्रयोग करना चाहिए। अधिक मात्रा में डाइपर का प्रयोग या अधिक समय तक मलद्वार का गीला बना रहना बच्चे की त्वचा के लिए हानिकारक होता है।

बच्चों

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