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मंगलवार, 3 मार्च 2015

इस ‘संख्या’ का राज क्या है ?

इस 'संख्या' का राज क्या है ?



देखिए जरा ! चीन ने फिर कमाल कर दिखाया और चीन ही क्यों अमेरिका, इंग्लैंड ना जाने कितने ऐसे देश हैं जिनका गुणगान उनके देश के लोग भले ही ना करें पर भारतीय उनका गुणगान करने में पीछे नहीं रहते हैं. क्या आप भी उन लोगों में एक हैं जिन्हें 'आई एम इंडियन' कहना अच्छा नहीं लगता है तो यकीनन इसे पढ़ने के बाद आप गर्व से कहेंगे 'आई एम इंडियन'.

'प्लास्टिक सर्जरी' इस शब्द को सुनते ही आपके दिमाग में विदेशी डॉक्टरों के चेहरे घूमने लगते होंगे पर जरा ठहरिए ! एक बार इस सच को भी जान लीजिए. 2000 ईसा पूर्व पहले भारत में प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत हुई और बाद में जाकर भारत अन्य देशों के लिए प्लास्टिक सर्जरी के मामले में मार्गदर्शक बन गया.

कुदरत का करिश्मा कहें या फिर पिछले जन्म का…..

शायद ही कोई ऐसा हो जिसे हीरे के आभूषण पसंद ना आते हों. क्या आप जानते हैं कि 5000 साल पहले भारत में हीरे को खोजा गया था.

अधिकाश लोग यह जानते होंगे कि मारकोनी ने रेडियो तरंगों का इस्तेमाल संदेश भेजने के लिए किया. मारकोनी को बिना तार के संदेश भेजने की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार भी दिया गया पर सबसे पहले रेडियो द्वारा संदेश भेजने का नमूना सर जगदीश चन्द्र बोस ने पेश किया था.

किसी भी प्रकार के संदेश को लिखने के लिए स्याही का प्रयोग किया जाता है पर क्या आप जानते हैं कि चौथी शताब्दी ईसा पूर्व साउथ इंडिया में नुकीली सुई के द्वारा स्याही का प्रयोग किया जाने लगा था.

धातु विद्या की शुरुआत भारत में सबसे पहले की गई थी और भारत अन्य देशों के लिए मार्गदर्शक बना. दो हजार साल पहले भारत में स्टील धातु निर्मित की गई थी.

छठी शताब्दी ईसा पूर्व चिकित्सक सुश्रुत, मोतियाबिन्द की सर्जरी के बारे में जानकारी रखते थे. भारत को अपना मार्गदर्शक बनाकर ही चीन ने इस सर्जरी की शुरुआत की.

चेंज योर सिग्नेचर! आपकी तकदीर बदल जाएगी

क्या आप जानते हैं कि छठी शताब्दी के लगभग भारत में गुप्ता साम्राज्य में शतरंज का खेल खेला जाता था. इतना ही नहीं, सांप-सीढ़ी के खेल को भी सालों पहले भारतीय राजा-महाराजा खेला करते थे.

सोलहवीं शताब्दी में मुगल शासक अकबर के शासनकाल के समय ऐसे घर का निर्माण किया गया था जिसे कुछ ही समय में उठाकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता था.

आज मार्केट में हजार किस्म के शैम्पू हैं पर क्या आप जानते हैं कि शैम्पू शब्द को 'चम्पू' शब्द से लिया गया है. मुगल शासनकाल के समय चम्पू का इस्तेमाल सिर्फ बालों में तेल लगाने के लिए किया जाता था.

ऐसा माना जाता है कि विदेशों से ही फ्लश टॉयलेट का चलन शुरू हुआ पर ऐसा नहीं है. हड़प्पा सभ्यता के समय फ्लश टॉयलेट की खोज की जा चुकी थी.

द्धिआधारी अंक की खोज पिंगल ने 200 ईसा पूर्व की थी. पिंगल संस्कृत में 'छन्दशास्त्र' के रचनाकार का पारंपरिक नाम है.

बहुत रोचक है इस होटल में प्रवेश के नियम !!

कागज से बाहर निकल जाती है यह पेंटिंग

अद्भुत है ग्यारहवीं शताब्दी में बना यह मंदिर!!



अदृश्य शक्तियों ने इस वैज्ञानिक को दिए कई झटके!!

अदृश्य शक्तियों ने इस वैज्ञानिक को दिए कई झटके!!

संसार में ऐसी कई रहस्यमयी बातें है जिनके आगे विज्ञान भी घुटने टेक देती है. एक ऐसी अदृश्य शक्ति जो इंसान और विज्ञान की कल्पना से भी बहुत आगे की बात हो. संसार में पल-पल कई ऐसी रहस्यमयी घटना घट रही है जिसके पीछे की कहानी पर यकीन करना भी मुश्किल होता है. नित्य नई विज्ञान का विकास भी इस रहस्यमयी दुनिया को समझ नहीं पाया है. आइए जानते हैं संसार में होने वाली एक ऐसी ही रहस्यमयी घटना को जिसके आगे विज्ञान भी घुटने टेक चुकी है...


अदृश्य शक्तियों की कहानी आपने बहुत सुनी होगी पर आज की एक सच्ची कहानी पहली बार आप जानेंगे. यह बात आज से कई साल पुरानी है जब मिस्र में राजा महाराजाओं का राज चलता था. कहा जाता है कि उस समय में पिरामिडों के भीतर मिस्र की बड़ी-बड़ी हस्तियों के शवों को ममी के रूप में दफ़नाया गया था. मिस्र के अधिकतर पिरामिड एक ही तरीके से बनाए गए हैं लेकिन इन सबके बीच ग्रेट पिरामिड की संरचना थोड़ी अलग और अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है.



मिस्र का यह ग्रेट पिरामिड मिस्र के राजा खुफ़ू की कब्र है जिसका निर्माण आज से करीब 4500 वर्ष पूर्व किया गया था. 1874 में दो खगोलशास्त्रियों ने यह देखने के लिए वहाँ पहुचें थे. कई लोगों ने यहाँ पहुँच कर इस ग्रेट पिरामिड के रहस्यों को जानना चाहा था. इस सिलसिलें में एक अन्वेषक सर सीमन भी थे. स्थानीय अरबी गाइड की सहायता से सर सीमन ग्रेट पिरामिड के ऊपर पहुंच गए. लेकिन शायद यही उनकी सबसे बड़ी गलती साबित हुई क्योंकि वहां पहुंचकर उन्होंने जो महसूस किया वो हिला देने वाला था.


सर सीमन के साथ गए अरबी गाइड ने यह महसूस किया कि जैसे ही वह अपने हाथ खोलकर आगे की ओर फैलाते हैं, वैसे ही एक बहुत अजीब और तेज आवाज आनी शुरू हो जाती है. सीमन ने अपनी तर्जनी अंगुली बाहर की ओर की तो उन्हें उस अंगुली पर अजीबोगरीब सिहरन हुई. वह समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? इतने में ही उनके साथ एक और घटना घटी. सर सीमन अपने साथ एक वाइन की बोतल लेकर गए थे, जब उन्होंने उस बोतल में से वाइन पीने की कोशिश की तब उन्हें बिजली का जोरदार झटका लगा.


सीमन ने वाइन की बोतल को गीले कागज से ढककर अपने सिर पर रख दिया पर जैसे ही उन्होंने वाइन की बोतल अपने सिर पर रखी अचानक से बहुत तेज बिजली चमकने लगी. बोतल के भीतर से चिंगारियां निकलने लगीं.

गाइड को यकीन हो गया कि इस स्थान पर नकारात्मक ताकतें मौजूद हैं. सर सीमन ने वो बोतल गाइड के हाथ में भी दी और जैसे ही उसने ये बोतल पकड़ी उसे भी बहुत तेज बिजली का झटका लगा. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पिरामिड के ऊपर ऐसा क्या है जो इतनी तेज बिजली का उत्पादन कर सकता है. यह बातें आज भी उन वैज्ञानिकों के साथ-साथ बहुत से लोगों के लिए भी राज की बात है. पहली नजर में यह किसी अदृश्य शक्तियों का ही प्रकोप लगता है. आपकी नज़रों में सच्चाई जो भी हो, पर इस पुरे घटनाक्रम को यूं ही नजर अंदाज नहीं किया जा सकता 

बिना इंटरनेट ऐसे करें जीमेल इस्तेमाल

बिना इंटरनेट ऐसे करें जीमेल इस्तेमाल
इंटरनेट के बिना यह दुनिया कितनी अधूरी है. आज के युवाओं के लिए इंटरनेट के बिना एक दिन बिताना जैसे पानी के बिना मछली का जीना हो जाता है. लेकिन सोचिए कभी इंटरनेट उपलब्ध ना हो और आपको जीमेल पर अपनी महत्वपूर्ण मेल चेक करनी हो तो आप क्या करेंगे? इस समस्या का एक ही हल है और वह है बिना इंटरनेट के चलने वाला
How to Use Gmail without Internet हम जीमेल का इस्तेमाल कई कारणों से करते हैं. कुछ जीमेल का इस्तेमाल ईमेल के लिए करते हैं तो कुछ के लिए इसका फायदा सिर्फ चैटिंग के लिए हो पाता है. पर कुछ भी हो आज लोगों के लिए जीमेल बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है और इस जीमेल से एक दिन भी दूर रह पाना मुश्किल भरा काम होता है. ऐसे में आपके और जीमेल के बीच इंटरनेट ना आए इसलिए गूगल क्रोम लेकर आया है ऑफलाइन गूगल मेल सेवा.
Offline Google Mail Service ऑफलाइन गूगल मेल सेवा आपको बिना इंटरनेट के जीमेल एक्सेस करने की आजादी प्रदान करता है. हालांकि बिना इंटरनेट के जीमेल इस्तेमाल करने के लिए आपके कम्प्यूटर में क्रोम वेब ब्राउजर होना चाहिए. इस ब्राउजर के बिना आप इस सेवा का लाभ नहीं उठा सकते.
Steps to Use offline Gmail Service:
Google Crome: क्रोम वेब ब्राउजर में जीमेल ऑफ लाइन वेब एप्लीकेशन द्वारा आप अपने ईमेल एकाउंट को बिना इंटरनेट यानि ऑफ लाइन भी यूज कर सकते हैं.

Offline Gmail App: सबसे पहले आपको एक एप्लीकेशन डाउनलोड करना होगा जिसके द्वारा आप बिना इंटरनेट के भी अपने ईमेल देख सकते हैं. यह एप्लीकेशन आपको यहां से मिलेगा. (यह एप्लीकेशन सिर्फ गूगल क्रोम में काम करेगा फायरफॉक्स या इंटरनेट एक्सप्लोरर में नहीं.) https://chrome.google.com/webstore/detail/ejidjjhkpiempkbhmpbfngldlkglhimk?utm_source=chrome-ntp-icon
जीमेल ऑफ लाइन प्लग इन इंस्टॉल होने के बाद अपने आप आपके बुकमार्क में इसका लिंक दिखने लगेगा.
ऑफ लाइन जीमेल इस्तेमाल करने के लिए आप जीमेल आइकॉन पर क्लिक कर इसे खोलें.
इसमें अपना जीमेल अकाउंट और
पासवर्ड
डालकर साइन इन करें
सारी प्रकियाएं पूरी होने के बाद आप बिना इंटरनेट के भी अपना जीमेल इस्तेमाल कर सकते हैं.

FROM SAFALTA KI RAAH

बिना इंटरनेट ऐसे करें फेसबुक इस्तेमाल

बिना इंटरनेट ऐसे करें फेसबुक इस्तेमाल


How to use Facebook without Internet

एक समय था जब युवा वर्ग में ऑरकुट एक बीमारी की तरह फैला था. युवा इसके प्रति ऐसे दिवाने थे कि कहीं भी हों दिन में अपना ऑरकुट अकाउंट खोलना नहीं भूलते थे. लेकिन अब ऑरकुट की जगह ले ली है फेसबुक ने. आज के युवा चाहे बुक से कितना भी दूर भागें लेकिन फेसबुक की दुनिया में उनका मन हमेशा लगता है.

फेसबुक के दीवाने तो इसे एक रोग मानते हैं. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हर समय फेसबुक पर अपडेट करना जाहिर करता है कि वह फेसबुक के नशे के आदी हो चुके हैं. कुछ "फेसबुक नशेड़ियों" को जब उनका इंटरनेट बंद हो जाता है तो बड़ी तकलीफ होती है. अब बिना इंटरनेट उन्हें फेसबुक की खुराक नहीं मिलती तो परेशानी तो होगी ही. लेकिन अब इसका भी एक उपाय है.

Facebook on mobile without internet

मोबाइल द्वारा बिना इंटरनेट के भी आप चाहे तो फेसबुक का मजा ले सकते हैं. मोबाइल पर बिना इंटरनेट के फेसबुक चलाना बेहद आसान है. इस ट्रिक के जरिए आप चाहे तो नोकिया 1100 जैसे मोबाइल पर भी फेसबुक का मजा ले सकते हैं. इस विधि के द्वारा आप अपना स्टेटस अपडेट कर सकेंगे, अपने दोस्तों के पोस्ट को लाइक कर सकते हैं, मैसेज का जवाब दे सकते हैं. तो चलिए जानते हैं कुछ आसान तरीकों को कि कैसे आप बिना इंटरनेट के फेसबुक का इस्तेमाल कर सकते हैं.
Steps to use Facebook on mobile without internet

बिना इंटरनेट कनेक्शन के मोबाइल द्वारा फेसबुक इस्तेमाल करने की सुविधा "फोनेटविश" (Fonetwish) सर्विस प्रदान करेगी. इसके लिए आपको निम्न तरीके आजमाने होंगे:

*325#: सबसे पहले आपको अपने मोबाइल पर *325# डायल करना होगा. इसके बाद आपके मोबाइल पर एक कंफर्मेशन मैसेज आएगा जिसे ओके कर दें. कंफर्मेशन मैसन मिलने के बाद अपना यूजर नेम और आईडी डालकर लॉगिन करें. इसके बाद आप बिना इंटरनेट चार्ज के ही फेसबुक इस्तेमाल कर सकते हैं.

नोट:

इस तरकीब द्वारा फेसबुक इस्तेमाल करने में आपको फेसबुक पर लोड की जाने वाले फोटो, वीडियो या ग्राफिक्स नहीं दिखेंगे, लेकिन यह फेसबुक वाल पर अन्य अपडेट दिखाएगा. इसकी मदद से आप संदेशों का जवाब भी दे सकते हैं.यह सेवा भारत में अभी सिर्फ एयरटेल, एयरसेल और टाटा डोकोमो ही दे रहे हैं.

क्या था वो श्राप जिसकी वजह से सीता की अनुमति के ,बिना उनका स्पर्श नहीं कर पाया रावण?

क्या था वो श्राप जिसकी वजह से सीता की अनुमति के ,बिना उनका स्पर्श नहीं कर पाया रावण?

विभिन्न धर्मों और मान्यताओं के देश भारत में अलग-अलग देवी-देवताओं को मानने वाले लोग रहते हैं. जिनमें से एक हैं भगवान श्रीराम. भगवान श्रीराम का संपूर्ण जीवनकाल मर्यादा के बंधन से बंधा है जिसकी वजह से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम कहा जाता है. पुत्र और पति दोनों ही रूपों में श्रीराम ने मर्यादा का पालन करने वाले श्रीराम की पत्नी माता सीता ने भी अपने पतिवृता धर्म को बखूबी निभाया. असुर सम्राट रावण की कैद में एक लंबा समय गुजारने के दौरान उन्होंने कभी रावण को अपने समीप तक नहीं आने दिया. वैसे कभी आपने सोचा है कि लंका का राजा रावण अगर चाहता तो सीता को किसी बेहे समय अपनी पत्नी बना सकता था लेकिन फिर भी उसने सीता की स्वीकृति का इंतजार क्यों किया? क्या वह सीता के क्रोध से डरता था या फिर श्रीराम के? वह किसी वचन में बंधा था या फिर वह श्रापित था? आलीशान महल को छोड़कर उसने क्यों सीता को एक वाटिका के अंदर क्यों रखा? इन सब सवालों के जवाब भी पुराणों में ही छिपे हैं:


रावण की सोने की लंका का निर्माण कुबेर ने किया था, जिसकी सुंदरता देखते ही बनती थी. यह भव्य और विशाल तो थी ही लेकिन इतना आकर्षक थी कि जो इसे देखता, बस देखता ही रह जाता. लेकिन फिर भी सीता को कैद करने के बाद रावण ने उन्हें लंका के किसी महल में नहीं बल्कि वाटिका में इसलिए रखा क्योंकि वह नलकुबेर के श्राप से भयभीत था.

स्वर्ग की खूबसूरत अप्सरा रंभा, कुबेर के पुत्र नलकुबेर से मिलने धरती पर आई थी और जब रावण की दृष्टि रंभा पर पड़ी तो वह उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया. रंभा ने उसे कहा भी कि वह नलकुबेर की होने वाली पत्नी हैं लेकिन फिर भी रावण ने उनका सम्मान नहीं किया और रंभा के साथ दुर्व्यवहार किया. जब इस बात की खबर नलकुबेर को मिली तो उसने रावण को श्राप दे दिया कि जब भी वह कभी किसी स्त्री को बिना उसकी स्वीकृति के छुएगा या फिर अपने महल में रखेगा तो वह उसी क्षण भस्म हो जाएगा. इसी श्राप की वजह से रावण ने बिना सीता की स्वीकृति के ना तो उन्हें स्पर्श किया और ना ही उन्हें अपने महल में रखा.

स्त्रियों से दूर रहने वाले हनुमान को इस मंदिर में स्त्री रूप में पूजा जाता है, जानिए कहां है यह मंदिर और क्या है इसका रहस्य



स्त्रियों से दूर रहने वाले हनुमान को इस मंदिर में स्त्री रूप में पूजा जाता है, जानिए कहां है यह मंदिर और क्या है इसका रहस्य



पवन पुत्र व राम भक्त हनुमान को युगों से लोग पूजते आ रहे हैं. उन्हें बाल ब्रह्मचारी भी कहा जाता है जिस कारण स्त्रियों को उनकी किसी भी मूर्ति को छूने से मना किया गया है. वे देवता रूप में विभिन्न मंदिरों में पूजे जाते हैं लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जहां पर हनुमान को पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के रूप में पूजा जाता है.

अद्भुत है यह मंदिर जहां हनुमान को स्त्री स्वरूप में देखा जाता है. छत्तीसगड़ के बिलासपुर में प्रसिद्ध यह मंदिर एक प्रचीन मंदिर है जहां पर हनुमान के स्त्री के रूप के पीछे छिपी दस हजार साल पुरानी एक कथा प्रचलित है.


कहां है ये मंदिर

यह मंदिर छत्तीसगड़ के बिलासपुर जिले से 25 कि. मी. दूर रतनपुर में है. कहा जाता है कि यह एक महत्वपूर्ण जगह है जो काफी महान है. इतना ही नहीं, इस नगरी को महामाया नगरी भी कहा जाता है क्योंकि यहां पर मां महामाया देवी मंदिर और गिरजाबंध में स्थित हनुमानजी का मंदिर है.


इस छोटी सी नगरी में स्थित हनुमान जी का यह विश्व में इकलौता ऐसा मंदिर है जहां हनुमान का नारी रूप में पूजन किया जाता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर में आने वाला हर एक भक्त हजारों मन्नतें लेकर आता है और इस स्थान से वो कभी भी निराश होकर नहीं लौटता. लोगों की श्रद्धा व भावना से भरपूर इस मंदिर में हर समय लोगों का आना-जाना लगा रहता है.


लेकिन क्यों होती है स्त्री रूप में पूजा?

कहा जाता है कि हनुमान का स्त्री रूप में यहां पूजा जाना एक कथा का परिणाम है जो हजारों वर्षों पुरानी है. तकरीबन दस हजार वर्ष पुरानी बात है जब एक दिन रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू जिन्हें एक शारीरिक कोढ़ था वे इस रोग के कारण काफी उदास हो गए. इस रोग की वजह से वे ना तो कोई काम कर सकते थे और ना ही जिंदगी का आनंद उठा सकते थे. उदासी में बैठे-बैठे राजा को नींद आ गई.


नींद के दौरान उन्होंने एक सपना देखा जिसमें उन्हें एक ऐसे रूप के दर्शन हुए जो वास्तव में है ही नहीं. उन्होंने संकटमोचन हनुमान को देखा लेकिन स्त्री रूप में. वे लंगूर की भांति दिख रहे थे लेकिन पूंछ नहीं थी, उनके एक हाथ में लड्डू से भरी थाली थी और दूसरे हाथ में राम मुद्रा. कानों में भव्य कुंडल व माथे पर सुंदर मुकुट माला भी थी. उनका यह दृश्य देख राजा अचंभित हो उठा.

इसीलिए बना ऐसा मंदिर

सपने में हनुमान के स्त्री रूप ने राजा से एक बात कही. हनुमान ने राजा से कहा कि "हे राजन् मैं तेरी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं और मैं तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर करूंगा. तू एक मंदिर का निर्माण करवा और उसमें मुझे बैठा. मंदिर के पीछे एक तालाब भी खुदवा जिसमें मेरी विधिवत पूजा करते हुए तू स्नान करना. इससे तुम्हारे शरीर का यह कोढ़ रोग आवश्य दूर हो जाएगा."

नींद खुलते आते ही राजा ने गिरजाबन्ध में ठीक वैसा ही मंदिर बनवाना शुरु कर दिया जैसा कि हनुमान ने उसके सपने में बताया था लेकिन मंदिर पूरा होते ही राजा को उसमें रखने के लिए मूर्ति कहां से लाई जाए यह चिंता सताने लगी. इसका उपाय भी संकटमोचन हनुमान ने दोबारा से राजा के स्वप्न में आकर दिया.


एक रात हनुमान राजा के सपने में फिर से आए और कहा कि "मां महामाया के कुण्ड में मेरी मूर्ति रखी हुई है. हे राजन् तू उसी मूर्ति को यहां लाकर मंदिर में स्थापित करवा." अगले दिन ही राजा अपने परिजनों और पुरोहितों के साथ देवी महामाया के मंदिर में गए लेकिन बहुत ढूंढने पर भी उन्हें मूर्ति नहीं मिली. राजा काफी बेचेन हो गया.

हताश राजा इसी चिंता में विश्राम करने के लिए अपने कक्ष में आया और सो गया. नींद आते ही हनुमान फिर से राजा के सपने में आए और बोले "राजन तू हताश न हो मैं वहीं हूं तूने ठीक से तलाश नहीं किया. उस मंदिर में जहां लोग स्नान करते हैं उसी में मेरी मूर्ति है."


जब राजा ने वह मूर्ति खोजे तो यह वही मूर्ति थी जिसे राजा ने अपने स्वप्न में देखा था. मूर्ति को पाते ही राजा प्रसन्न हो उठा और जल्द से जल्द उसकी स्थापना मंदिर में करवाई. हनुमान के निर्देश अनुसार इस मंदिर के पीछे तालाब भी खुदवाया गया. प्रसन्नता भरे राजा ने हनुमान से वरदान भी मांगा था कि जो भी यहां दर्शन को आए उसकी हर इच्छा अवश्य पूरी हो.

एक अद्भुत तेज है इस मूर्ति में

राजा को मिली इस मूर्ति में अनेक विशेषताएं हैं. इसका मुख दक्षिण की ओर है और साथ ही मूर्ति में पाताल लोक़ का चित्रण भी है. मूर्ति में हनुमान को रावण के पुत्र अहिरावण का संहार करते हुए दर्शाया गया है. यहां हनुमान के बाएं पैर के नीचे अहिरावण और दाएं पैर के नीचे कसाई दबा हुआ है. हनुमान के कंधों पर भगवान राम और लक्ष्मण की झलक है. उनके एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में लड्डू से भरी थाली है. कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 84 किलोमीटर दूर रमई पाट में भी एक ऐसी ही मूर्ति स्थापित है.

क्या है इस रंग बदलते शिवलिंग का राज जो भक्तों की हर मनोकामना पूरी करता है?


चमत्कारों से भरी इस दुनिया में कब क्या हो जाए कुछ पता नहीं. हालांकि आज विज्ञान ऐसे बहुत से चमत्कारों का जवाब दे चुका है लेकिन कई सवाल ऐसे भी हैं जिनका जवाब विज्ञान की कसौटी पर भी खरा नहीं उतर पा रहा है. ऐसा ही एक सवाल है धौलपुर का शिवलिंग.

राजस्थान के धौलपुर जिले में स्थित यह शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है लेकिन ऐसा क्यों होता है इसका जवाब ना तो किसी वैज्ञानिक के पास है और ना ही ही कोई अन्य अभी तक इस रहस्य से पर्दा उठा पाया है.
धौलपुर का ये इलाका चंबल के बीहड़ों के लिए तो प्रसिद्ध है ही सही लेकिन साथ में रंग बदलने वाले इस शिवलिंग, जिसका रंग दिन में लाल, दोपहर को केसरिया और रात को सांवला हो जाता है, के विषय में व्याप्त कहानियां बहुत से लोगों को यहां आने के लिए प्रेरित करती हैं.

भगवान अचलेश्वर महादेव के इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है. यहां आने का रास्ता बेहद पथरीला और टेढ़ा है लेकिन इस मंदिर की मान्यता भक्तों को यहां खींचकर ले जाती है.
इस शिवलिंग के विषय में ऐसा माना जाता है कि जो भी कुंवारा युवक या कुंवारी युवति यहां शादी की मन्नत मांगने आते हैं तो बहुत ही जल्दी उनकी ये मुराद पूरी हो जाती है.
इस शिवलिंग एक अनोखी खासियत यह भी है कि इसके उद्भव के स्थान या कहें इसके छोर तक कोई नहीं पहुंच पाया है. ऐसा कहा जाता है कि काफी समय पहले शिव भक्तों ने शिवलिंग के पास खुदाई कर इसके छोर तक पहुंचने का प्रयास किया लेकिन  उनका यह प्रयास पूरी तरह विफल रहा.
आज भी यह एक रहस्य ही है कि इस शिवलिंग का उद्भव कैसे हुआ और कैसे ये अपना रंग बदलता है.

FROM SAFALTA KI RAAH

होली के अवसर पर चुनावी रंग तो चढ़ना ही था-हिन्दी चिंत्तन लेख


     

      अगर अंतर्मन सूखा हो तो बाहर पानी में कितने भी प्रकार के रंग डालकर उन्हें उड़ाओ क्षणिक प्रसन्नता के बाद फिर वही उष्णता घिर आती है।  बाह्य द्रव्यमय रंगों का रूप है दिखता है उसमें गंध है जो सांसों में आती है , एक दूसरे पर रंग डालते हुए शोर होता है उसका स्वर है, दूसरे की देह का स्पर्श है। पांचों इंद्रियों की सक्रियता तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह थक नहीं जाती।  थकने के बाद विश्राम की चाहत! एक पर्व मनाने का प्रयास अंततः थकावट में बदल जाता है।

      आदमी बोलने पर थकता है, देखने में थकता है, सुनने में थकता है, चलते हुए एक समय तेज सांसें लेते हुए थकता है, किसी एक चीज का स्पर्श लंबे समय तक करते हुए थकता है। आनंद अंततः विश्राम की तरफ ले जाता है।  यह विश्राम इंद्रियों की  सक्रियता पर विराम लगाता है। यह विराम देह की बेबसी से उपजा है। देह की बेबसी मन में होती है और तब दुनियां का कोई नया विषय मस्तिष्क में स्थित नहीं हो सकता।  व्यथित इंद्रियां विश्राम करने  के समय स्वयं को सहमी लगती हैं।

      योग साधकों की होली अंतर्मन में रंगों के दर्शन करते हुए बीतती है।  एकांत में आत्मचिंत्तन करने का सुअवसर पर मिलने पर अध्यात्मिक चक्षु, कर्ण, नासिका, मुख तथा मस्तिष्क  काम करने लगता है।  बाहर के रंग सूर्य की उष्मा से सूखने के साथ ही फीके होते हैं पर आंतरिक रंग ध्यान से उत्पन्न ऊर्जा से अधिक गहरे होते जाते हैं।  ऐसे में इस बात की अनुभूति होती है कि बाह्य सुख सदैव दुःख में बदलते हैं। जिस तरह हम करेला खाये या मिठाई अंततः पेट में कचड़े का ही रूप उनको मिलता है।  उसी तरह कानों से सुने गये स्वर, आंखों से देखे गये सुदंर दृश्य, नासिका से ली गयी सुगंध और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं का अनुभव अंततः स्मृतियों में बसकर कष्ट का कारण बनता है।  हमने वह खाया उसे फिर खाना चाहते हैं। हमने वह देखा फिर देखना चाहते हैं। हमने वह सुना फिर सुनना चाहते हैं। हमने गुलाब के फूल की खुशबू ली फिर लेना चाहते हैं। हमने सुंदर वस्तु को छुआ हम उसे फिर छूना चाहते हैं।  यह लोभ सताता है।   इसका कारण यह कि इन सुखों से प्राप्त विकार मन में बना हुआ है।  योग साधक अपनी साधना से विकार रहित हो जाते हैं। इंद्रियों के गुणों के पांचों विषय-रूप, रस, गंध, स्वर तथ स्पर्श-का सत्य जानते हैं।  इन गुणों के भी गुण वह समझते हैं। इसलिये वह किसी विषय को अपनी इंद्रियों के साथ  ग्रहण करते हुए भी उसके गुणों में लिप्त नहीं होते। योग साधक किसी विषय या वस्तु को छूते हैं, स्वर सुनते हैं, दृश्य देखते हैं, गंध सूंघते हैं, भोजन का स्वाद भी लेते हैं पर उससे प्राप्त सुख का तुरंत त्याग भी कर देते हैं ताकि वह अंदर जाकर दुःख का रूप न ले। अपने अभ्यास से वह विकारों को ध्यान से ध्वस्त कर देते हैं।

      मनुष्य की इंद्रियां बाहर सहजता से विचरण करती है। उन पर नियंत्रण करना कठिन है यह कहा जाता है।  योगसाधकों का इंद्रियों पर नियंत्रण सहज नहीं वरन् स्वभाविक रूप से होता है। इस संसार में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं। एक सहज योग दूसरा असहज योग। योग सभी करते हैं। सामान्य आदमी इंद्रियों के वश होकर सांसरिक विषयों से जुड़ता है जिससे वह अंततः असहज को प्राप्त होता है  पर योग साधक उन पर नियंत्रण कर उपभोग करता है और हमेश सहज बना रहता है।  सामान्य मनुष्य होने का अर्थ असिद्ध होना नहीं है और योग साधक को सिद्ध भी नहीं समझना चाहिये।  असहज योगी में नैतिक और चारित्रिक दृढ़ता का अभाव होता है। कोई योग साधक है उसके लिये यह दोनों शक्तियां प्रमाण होती हैं। अगर नहीं है तो इसका आशय यह है कि उसके अभ्यास में कमी है। अपने योग साधक होने का प्रमाण दूसरों को दिखाने की बजाय स्वयं देखना चाहिये।  हम भीड़ में जाकर अगर यह प्रमाण दिखायेंगे तो सामान्य लोग यकीन नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास ज्ञान नहीं होता। सहज योगियों के सामने प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि वह दूसरे योग साधक की चाल देखकर ही समझ लेते हैं।

      अध्यात्मिक चिंत्तन, अध्ययन, मनन और अनुसंधान एकांत का विषय है। सत्संग करना चाहिये ताकि दूसरे लोगों से भी अनुभव किये जा सकें।  आत्म प्रचार की भूख सभी को होती है पर योग साधक के कार्य उनके लिये प्रचार का काम स्वतः करते हैं। फिर पं्रचार कर प्रभावित भी किसे करना है? उन लोगों के सामने स्वप्रचार का क्या लाभ जिन्हें सांसरिक विषय भी अच्छे लगते हैं और त्यागियों के सामने प्रचार कोई लाभ भी नहीं है क्योंकि वह परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपने को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिये। सहज योग के लिये यह संभव है। जब संसार के सभी लोग असहज योग में रत हों तक सहज योगी को अपनी अनुभूतियां आनंद देती हैं। इनको बांटना संभव नहीं क्योंकि इनका न कोई रूप है न रंस है न ही स्वर है न गंध है न ही इसे स्पर्श किया जा सकता है।

      इस होली और घुलेड़ी पर एकांत चिंत्तन करते हुए हमने इतना ही पाया। इस अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठको को बधाई

FROM SAFALTA KI RAAH

पतंजलि योग साहित्य-इन्द्रियों की क्रियाएँ ही दृश्य हैं


     

                                    हमारी इंद्रियां हमेशा बाहर ही सक्रिय रहने को लालायित रहती है।  विशेष रूप से हमारी आंखें हमेशा ही दृश्य देखने को उत्साहित रहती है।  हम जिन दृश्यों को देखते हैं वह दरअसल प्रकृति में विचर रहे विभिन्न जीवों की लीला है।  जिनकी उत्पति भोग तथा मुक्ति के लिये होती है। कुंछ लोग अपने भोग करने के साथ ही उसके लिये साधन प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं तो उनकी यह सक्रियता दूसरे मनुष्य के लिये दृश्य उपस्थिति करती है।  कुछ लोग मुक्ति के लिये योग साधन आदि करते हैं तो भी वह दृश्य दिखता है।  मुख्य विषय यह है कि हम किस प्रकार के दृश्य देखते हैं और उनका हमारे मानस पटल पर  क्या प्रभाव पड़ता है इस पर विचार करना चाहिये।

                        हम कहीं खिलते हुए फूल देखते हैं तो हमारा मन खिल उठता है। कहीं हम सड़क पर रक्त फैला देख लें तो एक प्रकार से तनाव पैदा होता है। यह दोनों ही स्थितियां भले ही विभिन्न भाव उत्पन्न करती हैं पर योग साधक के लिये समान ही होती है।  वह जानता है कि ऐसे दृश्य प्रकृति का ही भाग हैं।

                        हम देख रहे हैं कि मनोरंजन व्यवसायी कभी सुंदर कभी वीभत्य तो कभी हास्य के भाव उत्पन्न करते हैं। वह एक चक्र बनाये रखना चाहते हैं जिसे आम इंसान उनका ग्राहक बना रहे। पर्दे पर फिल्म चलती है उसमें कुछ लोग  अभिनय कर रहे हैं।  वहां एक कहानी है पर उसे देखने वाले  व्यक्ति के हृदय में पर्दे पर चल रहे दृश्यों के साथ भिन्न भिन्न भाव आते जाते हैं। यह भाव इस तरह आते हैं कि जैसे वह कोई सत्य दृश्य देख रहा है।  ज्ञानियों के लिये पर्दे के नहीं वरन् जमीन पर चल रहे दृश्य भी उसके मन पर प्रभाव नहीं डालते।  वह जानता है कि जो घटना था वह तय था और जो तय है वह घटना ही है।  सांसरिक विषयों के जितने प्रकार के  रस हैं उतने ही मनुष्य तथा उसकी सक्रियता से उत्पन्न दृश्यों के रंग हैं।

पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि

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प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम

                        हिन्दी में भावार्थ-प्रकाश, क्रिया तथा स्थिति जिनका स्वभाव है भूत वह  इंद्रियां जिसका प्रकट स्वरूप है और  भोग और मुक्ति का संपादन करना ही जिसका लक्ष्य है ऐसा दृश्य है।

                        हम दृश्यों के चयन का समय या स्थान नहीं तय कर सकते पर इतना तय जरूर कर सकते हैं कि किस दृश्य का प्रभाव अपने दिमाग पर पड़ने दें या नहीं।  जिन दृश्यों से मानसिकता कलुषित हो उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये। हृदय विदारक दृश्य कोई शरीर का रक्त नहीं बढ़ाते।  हमें समाचारों में ऐसे दृश्य दिखाने का प्रयास होता है। आजकल सनसनी ऐसे दृश्यों से फैलती है हो हृदय विदारक होती हैं। लोग उसे पर्दे पर देखकर आहें भरते हैं।  अखबारों में ऐसी खबरे पढ़कर  मन ही मन व्यग्रता का भाव लाते हैं।  अगर आदमी ज्ञानी नहीं है तो वह यंत्रवत् हो जाता है। मनोरंजन व्यवसायी तय करते हैं कि इस यंत्रवत खिलौने में कभी श्रृंगार, तो कभी हास्य कभी वीभत्स भाव पैदा कर किस तरह संचालित किया जाये।  आनंद वह उठाते हैं यंत्रवत् आदमी सोचता है कि मैने आनंद उठाया। इस भ्रम में उम्र निकल जाती है। चालाक लोग कभी स्वयं इन रसों में नहीं डूबते। ठीक ऐसे ही जैसे हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाता। फिल्म और धारावाहिकों में अनेक पात्र मारे गये पर उनके अभिनेता हमेशा जीवित मिलते हैं मगर उनके अभिनय का रस लोगों में बना रहता है।  संसार के विषयों और दृश्यों  में रस है पर ज्ञानी उनमें डूबते नहीं यही उनके प्रतिदिन के मोक्ष की साधना होती है।

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दूसरे की निंदा कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास अनुचित-संत तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख


    

      सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है।  बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है।  बहिर्मुखी  भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है।  यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ  कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि

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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।

'तुलसी' तिनके भागते, चलै भलाई भागि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।

'तुलसी' के कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं।  उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।

     अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं।  अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है।  उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं।  सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।

      हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।

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