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मंगलवार, 3 मार्च 2015
इस ‘संख्या’ का राज क्या है ?
अदृश्य शक्तियों ने इस वैज्ञानिक को दिए कई झटके!!
बिना इंटरनेट ऐसे करें जीमेल इस्तेमाल
बिना इंटरनेट ऐसे करें जीमेल इस्तेमाल
इंटरनेट के बिना यह दुनिया कितनी अधूरी है. आज के युवाओं के लिए इंटरनेट के बिना एक दिन बिताना जैसे पानी के बिना मछली का जीना हो जाता है. लेकिन सोचिए कभी इंटरनेट उपलब्ध ना हो और आपको जीमेल पर अपनी महत्वपूर्ण मेल चेक करनी हो तो आप क्या करेंगे? इस समस्या का एक ही हल है और वह है बिना इंटरनेट के चलने वाला
How to Use Gmail without Internet हम जीमेल का इस्तेमाल कई कारणों से करते हैं. कुछ जीमेल का इस्तेमाल ईमेल के लिए करते हैं तो कुछ के लिए इसका फायदा सिर्फ चैटिंग के लिए हो पाता है. पर कुछ भी हो आज लोगों के लिए जीमेल बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है और इस जीमेल से एक दिन भी दूर रह पाना मुश्किल भरा काम होता है. ऐसे में आपके और जीमेल के बीच इंटरनेट ना आए इसलिए गूगल क्रोम लेकर आया है ऑफलाइन गूगल मेल सेवा.
Offline Google Mail Service ऑफलाइन गूगल मेल सेवा आपको बिना इंटरनेट के जीमेल एक्सेस करने की आजादी प्रदान करता है. हालांकि बिना इंटरनेट के जीमेल इस्तेमाल करने के लिए आपके कम्प्यूटर में क्रोम वेब ब्राउजर होना चाहिए. इस ब्राउजर के बिना आप इस सेवा का लाभ नहीं उठा सकते.
Steps to Use offline Gmail Service:
Google Crome: क्रोम वेब ब्राउजर में जीमेल ऑफ लाइन वेब एप्लीकेशन द्वारा आप अपने ईमेल एकाउंट को बिना इंटरनेट यानि ऑफ लाइन भी यूज कर सकते हैं.
Offline Gmail App: सबसे पहले आपको एक एप्लीकेशन डाउनलोड करना होगा जिसके द्वारा आप बिना इंटरनेट के भी अपने ईमेल देख सकते हैं. यह एप्लीकेशन आपको यहां से मिलेगा. (यह एप्लीकेशन सिर्फ गूगल क्रोम में काम करेगा फायरफॉक्स या इंटरनेट एक्सप्लोरर में नहीं.) https://chrome.google.com/webstore/detail/ejidjjhkpiempkbhmpbfngldlkglhimk?utm_source=chrome-ntp-icon
जीमेल ऑफ लाइन प्लग इन इंस्टॉल होने के बाद अपने आप आपके बुकमार्क में इसका लिंक दिखने लगेगा.
ऑफ लाइन जीमेल इस्तेमाल करने के लिए आप जीमेल आइकॉन पर क्लिक कर इसे खोलें.
इसमें अपना जीमेल अकाउंट और
पासवर्ड
डालकर साइन इन करें
सारी प्रकियाएं पूरी होने के बाद आप बिना इंटरनेट के भी अपना जीमेल इस्तेमाल कर सकते हैं.
FROM SAFALTA KI RAAH
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क्या है इस रंग बदलते शिवलिंग का राज जो भक्तों की हर मनोकामना पूरी करता है?
चमत्कारों से भरी इस दुनिया में कब क्या हो जाए कुछ पता नहीं. हालांकि आज विज्ञान ऐसे बहुत से चमत्कारों का जवाब दे चुका है लेकिन कई सवाल ऐसे भी हैं जिनका जवाब विज्ञान की कसौटी पर भी खरा नहीं उतर पा रहा है. ऐसा ही एक सवाल है धौलपुर का शिवलिंग.
राजस्थान के धौलपुर जिले में स्थित यह शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है लेकिन ऐसा क्यों होता है इसका जवाब ना तो किसी वैज्ञानिक के पास है और ना ही ही कोई अन्य अभी तक इस रहस्य से पर्दा उठा पाया है.
धौलपुर का ये इलाका चंबल के बीहड़ों के लिए तो प्रसिद्ध है ही सही लेकिन साथ में रंग बदलने वाले इस शिवलिंग, जिसका रंग दिन में लाल, दोपहर को केसरिया और रात को सांवला हो जाता है, के विषय में व्याप्त कहानियां बहुत से लोगों को यहां आने के लिए प्रेरित करती हैं.
भगवान अचलेश्वर महादेव के इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है. यहां आने का रास्ता बेहद पथरीला और टेढ़ा है लेकिन इस मंदिर की मान्यता भक्तों को यहां खींचकर ले जाती है.
इस शिवलिंग के विषय में ऐसा माना जाता है कि जो भी कुंवारा युवक या कुंवारी युवति यहां शादी की मन्नत मांगने आते हैं तो बहुत ही जल्दी उनकी ये मुराद पूरी हो जाती है.
इस शिवलिंग एक अनोखी खासियत यह भी है कि इसके उद्भव के स्थान या कहें इसके छोर तक कोई नहीं पहुंच पाया है. ऐसा कहा जाता है कि काफी समय पहले शिव भक्तों ने शिवलिंग के पास खुदाई कर इसके छोर तक पहुंचने का प्रयास किया लेकिन उनका यह प्रयास पूरी तरह विफल रहा.
आज भी यह एक रहस्य ही है कि इस शिवलिंग का उद्भव कैसे हुआ और कैसे ये अपना रंग बदलता है.
FROM SAFALTA KI RAAH
होली के अवसर पर चुनावी रंग तो चढ़ना ही था-हिन्दी चिंत्तन लेख
अगर अंतर्मन सूखा हो तो बाहर पानी में कितने भी प्रकार के रंग डालकर उन्हें उड़ाओ क्षणिक प्रसन्नता के बाद फिर वही उष्णता घिर आती है। बाह्य द्रव्यमय रंगों का रूप है दिखता है उसमें गंध है जो सांसों में आती है , एक दूसरे पर रंग डालते हुए शोर होता है उसका स्वर है, दूसरे की देह का स्पर्श है। पांचों इंद्रियों की सक्रियता तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह थक नहीं जाती। थकने के बाद विश्राम की चाहत! एक पर्व मनाने का प्रयास अंततः थकावट में बदल जाता है।
आदमी बोलने पर थकता है, देखने में थकता है, सुनने में थकता है, चलते हुए एक समय तेज सांसें लेते हुए थकता है, किसी एक चीज का स्पर्श लंबे समय तक करते हुए थकता है। आनंद अंततः विश्राम की तरफ ले जाता है। यह विश्राम इंद्रियों की सक्रियता पर विराम लगाता है। यह विराम देह की बेबसी से उपजा है। देह की बेबसी मन में होती है और तब दुनियां का कोई नया विषय मस्तिष्क में स्थित नहीं हो सकता। व्यथित इंद्रियां विश्राम करने के समय स्वयं को सहमी लगती हैं।
योग साधकों की होली अंतर्मन में रंगों के दर्शन करते हुए बीतती है। एकांत में आत्मचिंत्तन करने का सुअवसर पर मिलने पर अध्यात्मिक चक्षु, कर्ण, नासिका, मुख तथा मस्तिष्क काम करने लगता है। बाहर के रंग सूर्य की उष्मा से सूखने के साथ ही फीके होते हैं पर आंतरिक रंग ध्यान से उत्पन्न ऊर्जा से अधिक गहरे होते जाते हैं। ऐसे में इस बात की अनुभूति होती है कि बाह्य सुख सदैव दुःख में बदलते हैं। जिस तरह हम करेला खाये या मिठाई अंततः पेट में कचड़े का ही रूप उनको मिलता है। उसी तरह कानों से सुने गये स्वर, आंखों से देखे गये सुदंर दृश्य, नासिका से ली गयी सुगंध और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं का अनुभव अंततः स्मृतियों में बसकर कष्ट का कारण बनता है। हमने वह खाया उसे फिर खाना चाहते हैं। हमने वह देखा फिर देखना चाहते हैं। हमने वह सुना फिर सुनना चाहते हैं। हमने गुलाब के फूल की खुशबू ली फिर लेना चाहते हैं। हमने सुंदर वस्तु को छुआ हम उसे फिर छूना चाहते हैं। यह लोभ सताता है। इसका कारण यह कि इन सुखों से प्राप्त विकार मन में बना हुआ है। योग साधक अपनी साधना से विकार रहित हो जाते हैं। इंद्रियों के गुणों के पांचों विषय-रूप, रस, गंध, स्वर तथ स्पर्श-का सत्य जानते हैं। इन गुणों के भी गुण वह समझते हैं। इसलिये वह किसी विषय को अपनी इंद्रियों के साथ ग्रहण करते हुए भी उसके गुणों में लिप्त नहीं होते। योग साधक किसी विषय या वस्तु को छूते हैं, स्वर सुनते हैं, दृश्य देखते हैं, गंध सूंघते हैं, भोजन का स्वाद भी लेते हैं पर उससे प्राप्त सुख का तुरंत त्याग भी कर देते हैं ताकि वह अंदर जाकर दुःख का रूप न ले। अपने अभ्यास से वह विकारों को ध्यान से ध्वस्त कर देते हैं।
मनुष्य की इंद्रियां बाहर सहजता से विचरण करती है। उन पर नियंत्रण करना कठिन है यह कहा जाता है। योगसाधकों का इंद्रियों पर नियंत्रण सहज नहीं वरन् स्वभाविक रूप से होता है। इस संसार में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं। एक सहज योग दूसरा असहज योग। योग सभी करते हैं। सामान्य आदमी इंद्रियों के वश होकर सांसरिक विषयों से जुड़ता है जिससे वह अंततः असहज को प्राप्त होता है पर योग साधक उन पर नियंत्रण कर उपभोग करता है और हमेश सहज बना रहता है। सामान्य मनुष्य होने का अर्थ असिद्ध होना नहीं है और योग साधक को सिद्ध भी नहीं समझना चाहिये। असहज योगी में नैतिक और चारित्रिक दृढ़ता का अभाव होता है। कोई योग साधक है उसके लिये यह दोनों शक्तियां प्रमाण होती हैं। अगर नहीं है तो इसका आशय यह है कि उसके अभ्यास में कमी है। अपने योग साधक होने का प्रमाण दूसरों को दिखाने की बजाय स्वयं देखना चाहिये। हम भीड़ में जाकर अगर यह प्रमाण दिखायेंगे तो सामान्य लोग यकीन नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास ज्ञान नहीं होता। सहज योगियों के सामने प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि वह दूसरे योग साधक की चाल देखकर ही समझ लेते हैं।
अध्यात्मिक चिंत्तन, अध्ययन, मनन और अनुसंधान एकांत का विषय है। सत्संग करना चाहिये ताकि दूसरे लोगों से भी अनुभव किये जा सकें। आत्म प्रचार की भूख सभी को होती है पर योग साधक के कार्य उनके लिये प्रचार का काम स्वतः करते हैं। फिर पं्रचार कर प्रभावित भी किसे करना है? उन लोगों के सामने स्वप्रचार का क्या लाभ जिन्हें सांसरिक विषय भी अच्छे लगते हैं और त्यागियों के सामने प्रचार कोई लाभ भी नहीं है क्योंकि वह परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपने को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिये। सहज योग के लिये यह संभव है। जब संसार के सभी लोग असहज योग में रत हों तक सहज योगी को अपनी अनुभूतियां आनंद देती हैं। इनको बांटना संभव नहीं क्योंकि इनका न कोई रूप है न रंस है न ही स्वर है न गंध है न ही इसे स्पर्श किया जा सकता है।
इस होली और घुलेड़ी पर एकांत चिंत्तन करते हुए हमने इतना ही पाया। इस अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठको को बधाई
FROM SAFALTA KI RAAH
पतंजलि योग साहित्य-इन्द्रियों की क्रियाएँ ही दृश्य हैं
हमारी इंद्रियां हमेशा बाहर ही सक्रिय रहने को लालायित रहती है। विशेष रूप से हमारी आंखें हमेशा ही दृश्य देखने को उत्साहित रहती है। हम जिन दृश्यों को देखते हैं वह दरअसल प्रकृति में विचर रहे विभिन्न जीवों की लीला है। जिनकी उत्पति भोग तथा मुक्ति के लिये होती है। कुंछ लोग अपने भोग करने के साथ ही उसके लिये साधन प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं तो उनकी यह सक्रियता दूसरे मनुष्य के लिये दृश्य उपस्थिति करती है। कुछ लोग मुक्ति के लिये योग साधन आदि करते हैं तो भी वह दृश्य दिखता है। मुख्य विषय यह है कि हम किस प्रकार के दृश्य देखते हैं और उनका हमारे मानस पटल पर क्या प्रभाव पड़ता है इस पर विचार करना चाहिये।
हम कहीं खिलते हुए फूल देखते हैं तो हमारा मन खिल उठता है। कहीं हम सड़क पर रक्त फैला देख लें तो एक प्रकार से तनाव पैदा होता है। यह दोनों ही स्थितियां भले ही विभिन्न भाव उत्पन्न करती हैं पर योग साधक के लिये समान ही होती है। वह जानता है कि ऐसे दृश्य प्रकृति का ही भाग हैं।
हम देख रहे हैं कि मनोरंजन व्यवसायी कभी सुंदर कभी वीभत्य तो कभी हास्य के भाव उत्पन्न करते हैं। वह एक चक्र बनाये रखना चाहते हैं जिसे आम इंसान उनका ग्राहक बना रहे। पर्दे पर फिल्म चलती है उसमें कुछ लोग अभिनय कर रहे हैं। वहां एक कहानी है पर उसे देखने वाले व्यक्ति के हृदय में पर्दे पर चल रहे दृश्यों के साथ भिन्न भिन्न भाव आते जाते हैं। यह भाव इस तरह आते हैं कि जैसे वह कोई सत्य दृश्य देख रहा है। ज्ञानियों के लिये पर्दे के नहीं वरन् जमीन पर चल रहे दृश्य भी उसके मन पर प्रभाव नहीं डालते। वह जानता है कि जो घटना था वह तय था और जो तय है वह घटना ही है। सांसरिक विषयों के जितने प्रकार के रस हैं उतने ही मनुष्य तथा उसकी सक्रियता से उत्पन्न दृश्यों के रंग हैं।
पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि
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प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम
हिन्दी में भावार्थ-प्रकाश, क्रिया तथा स्थिति जिनका स्वभाव है भूत वह इंद्रियां जिसका प्रकट स्वरूप है और भोग और मुक्ति का संपादन करना ही जिसका लक्ष्य है ऐसा दृश्य है।
हम दृश्यों के चयन का समय या स्थान नहीं तय कर सकते पर इतना तय जरूर कर सकते हैं कि किस दृश्य का प्रभाव अपने दिमाग पर पड़ने दें या नहीं। जिन दृश्यों से मानसिकता कलुषित हो उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये। हृदय विदारक दृश्य कोई शरीर का रक्त नहीं बढ़ाते। हमें समाचारों में ऐसे दृश्य दिखाने का प्रयास होता है। आजकल सनसनी ऐसे दृश्यों से फैलती है हो हृदय विदारक होती हैं। लोग उसे पर्दे पर देखकर आहें भरते हैं। अखबारों में ऐसी खबरे पढ़कर मन ही मन व्यग्रता का भाव लाते हैं। अगर आदमी ज्ञानी नहीं है तो वह यंत्रवत् हो जाता है। मनोरंजन व्यवसायी तय करते हैं कि इस यंत्रवत खिलौने में कभी श्रृंगार, तो कभी हास्य कभी वीभत्स भाव पैदा कर किस तरह संचालित किया जाये। आनंद वह उठाते हैं यंत्रवत् आदमी सोचता है कि मैने आनंद उठाया। इस भ्रम में उम्र निकल जाती है। चालाक लोग कभी स्वयं इन रसों में नहीं डूबते। ठीक ऐसे ही जैसे हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाता। फिल्म और धारावाहिकों में अनेक पात्र मारे गये पर उनके अभिनेता हमेशा जीवित मिलते हैं मगर उनके अभिनय का रस लोगों में बना रहता है। संसार के विषयों और दृश्यों में रस है पर ज्ञानी उनमें डूबते नहीं यही उनके प्रतिदिन के मोक्ष की साधना होती है।
FROM SAFALTA KI RAAH
दूसरे की निंदा कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास अनुचित-संत तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख
सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है। बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है। बहिर्मुखी भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है। यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि
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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।
'तुलसी' तिनके भागते, चलै भलाई भागि।।
सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।
'तुलसी' के कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं। उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।
अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं। अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है। उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं। सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।
हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।
FROM SAFALTA KI RAAH


















